लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती और कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती!

– डा. जगदीश गांधी, प्रख्यात शिक्षाविद् एवं संस्थापक–प्रबन्धक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

(1) जीवन में आने वाले संघर्षों का सामना उत्साह एवं साहस से करें :–
गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि जीवन एक संघर्ष है, एक चुनौती है, परीक्षास्थल है, रणक्षेत्र है – इसका सामना करना होगा, परीक्षा देनी होगी, संघर्ष तब तक चलेगा जब तक साँस चलेगी, इसलिये संघर्ष से भागना नहीं स्थिर होकर उसका सामना करना। जो व्यक्ति स्वयं को नकारते हैं, वे अपनी असफलता को बुलावा देते हैं। जीवन में यदि किसी कारणवश असफलता मिल भी जाए, तो भी उत्साह व साहस से इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति हेतु संघर्षरत् रहना चाहिए। असफलता के वातावरण की प्रबलता को मानवीय विवेक और मनोबल से बदला जा सकता है।

(2) सफलता सिफ‍र् हमारे दृष्टिकोण का परिणाम है :–
हर व्यक्ति अपने जीवन में प्रत्येक कार्य में सफलता प्राप्त करना चाहता है। सफलता सिफ‍र् संयोग नहीं बल्कि यह हमारे दृष्टिकोण का परिणाम है। लेकिन हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि जिन लोगों ने मुसीबतों को झेला है वे उन लोगों की तुलना में कही अधिक आत्मविश्वास से भरे हैं जिन्होंने कभी मुसीबतों का सामना ही नहीं किया। अंग्रेजी में एक कहा है, ‘‘एक शांत समुद्र में नाविक कभी कुशल नहीं बन पाता। (A smooth sea never made a skillful mariner)  भगवान कृष्ण का संदेश है –‘योग कर्मसु कौशलम्’ अर्थात् कर्म में कुशलता का योग है। एकाग्र मन से जो भी कार्य किया जाता है वह कार्य मन्त्र बन जाता है। एकाग्रता से सम्पन्न होने वाले कर्म में कौशल आ जाता है और कुशलता युक्त कर्म योग बनता है।

(3) कर्म की धुन पर आगे बढ़कर ही सफलता प्राप्त की जा सकती है :–
मुश्किले सबके रास्ते में आती हैं पर ईश्वर ने हमें उनका मुकाबला करने की शक्ति भी दी है। अपनी इन बातों को मैं दो कहानियों के माध्यम से रखना चाहता हूँ। जो इस प्रकार हैं :–
पहली कहानी : एक बार एक बहुत ही ऊँची चट्टान पर मेढ़कों की दौड़ आयोजित की गई। इस दौड़ में बहुत ही ऊँची चट्टान पर मेढ़कों को पहुँचना था। चढ़ाई एकदम खड़ी थी। चाराें तरफ से आवाजें आ रही थी कि ‘यह असंभव है, इतनी ऊँची चढ़ाई इन मेढ़कों की बस की बात नहीं है। दौड़ प्रारम्भ हुई, हताशा भरी आवाजें निरन्तर आती रही। देखते ही देखते कुछ मेढ़क बेहोश होकर गिरने लगे। फिर भी कुछ मेढ़क अभी भी दौड़ में बने हुए थे। आवाजें अभी भी आ रही थी कि ‘इनके बस का नहीं, कोई भी चट्टान पर नहीं चढ़ सकता। ये पिद्दी से मेढ़क क्या कर पायेंगे? धीरे–धीरे और मेढ़क बेहोश होकर गिरने लगे, निराशा भरे स्वर और बढ़े लेकिन सबके आश्चर्य का ठिकाना नहीं तब नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि एक मेढ़क चट्टान पर चढ़ने में सफल हो गया। सबने उसकी सफलता का रहस्य जानना चाहा तो मालूम हुआ कि वह बहरा है। हताशा भरी आवाजें उसने सुनी ही नहीं। वह तो अपने कर्म की धुन पर आगे ही बढ़ता रहा, बढ़ता रहा और अन्तत: चट्टान पर चढ़ ही गया।

(4) अपनी हिम्मत को बढ़ाकर संघर्ष करने वाले जीवन का संग्राम जीत जाते हैं :–
दूसरी कहानी : एक बार दो मेढ़क एक बाल्टी में यह समझ कर कूद गये कि बाल्टी में भरे पानी में खुब मजे करेंगे। दोनों मेढ़क बाल्टी में कूद गये! लेकिन यह क्या! बाल्टी में तो पानी की जगह मलाई भरी हुई थी जिसमें दोनों मेढ़क डूबने लगें। उसमें से एक मेढ़क हार मानकर अपनी मौत का इंतजार करने लगा जबकि दूसरा मेढ़क हार मानने को तैयार नहीं था और बाल्टी से बाहर निकलने के लिए अपने पैर को जोर–जोर से चलाने लगा। अरे यह क्या! अचानक उसने देखा वह ऊपर उठने लगा। उसके जोर–जोर से पैर चलाने से मलाई जोर–जोर से हिल रही थी जिसकी वजह से मक्खन बनने लगा था। यह देखकर उस मेढ़क में उम्मीद की एक नई लहर दौड़ गई। वह बहुत थक चुका था फिर भी अपने जीवन को बचाने के लिए अपने पैर को तेजी के साथ चलाता रहा। फिर क्या था! मक्खन बनता गया और आखिर में उस मक्खन के ढेर पर सवार होकर वह साहसी मेढ़क बच गया परन्तु निराशावादी मेढ़क उसी मलाई की बाल्टी में डूबकर मर गया। अत: अंत में जीत उसी की होती है जो कभी हार नहीं मानता। अधिक बुद्धि या बल ही केवल काम नहीं आते बल्कि मुश्किल हालात में अपनी हिम्मत को बढ़ाकर संघर्ष करने वाले जीवन का संग्राम जीत जाते हैं।

(5) कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती :–
जीवन में अगर सफलता मिलती है तो असफलता भी मिलती है। लेकिन जीवन में मिलने वाली हर असफलता के बाद हम स्वयं से पूछें कि इस घटना से मैंने क्या सीखा? तभी हम अपने रास्ते की रूकावटों को सफलता की सीढि़यों में बदल पाएँगे। हममें से प्रत्येक के भीतर कई गुण हैं और जो गुण नहीं हैं उनका भी विकास किया जा सकता है। आवश्यकता है केवल अपने गुणों को पहचानने की। जब हमें अपने गुणों का एहसास होता है तो हमारी शक्ति निश्चित रूप से बढ़ जाती है। इसलिए असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो। क्या कमी रह गई, देखों और सुधार करो। क्योंकि लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती और कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

(6) जिंदगी की मुश्किलों को हराकर अपनी तकदीर खुद लिखें :–
आज हम भी चारों ओर से निराशावादी शोर से घिरे हैं। यह कुछ नहीं कर सकता, इसे कुछ नहीं आता, आदि–आदि शब्दों को सुनकर हम निराश हो रहे हैं। जब हम कार्य की विशालता को देखते है, मार्ग की दुरहता को देखते हैं और स्वयं को अकेला पाते हैं तब हमारी हिम्मत टूट जाती है। लेकिन फिर भी कार्य करने का जुनून हमें कार्य करने को बाध्य करता है। युवाओं को समझना होगा कि जिन्दगी, ईश्वर की अनमोल धरोहर स्वरूप है और उसे यूं कायरों की भांति बर्बाद न करें बल्कि जिंदगी की मुश्किलों से डरकर हारने की अपेक्षा मुश्किलों को हराकर अपनी तकदीर खुद लिखें। क्योंकि ‘‘तकदीर के खेल से निराश नहीं होते, जिदंगी में कभी उदास नहीं होते। हाथों की लकीरों पर यकीन न कर, तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते।’’

–जय जगत–

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